अमेरिका के विस्कॉन्सिन स्थित एक विवादित रिसर्च फ़ार्म से 1,500 बीगल कुत्तों को रेस्क्यू कर आज़ाद कराया गया है। सालों तक मेडिकल टेस्टिंग के लिए इस्तेमाल किए गए ये कुत्ते अब पहली बार खुले माहौल, प्यार और एक नए घर की तलाश में हैं।
अमेरिका के विस्कॉन्सिन राज्य से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने लाखों लोगों को भावुक कर दिया। दशकों से मेडिकल रिसर्च और लैब टेस्टिंग के लिए इस्तेमाल किए जा रहे 1,500 बीगल कुत्तों को आखिरकार आज़ादी मिल गई है। ये कुत्ते अब रिसर्च फ़ार्म की बंद ज़िंदगी छोड़कर इंसानों के बीच एक सामान्य और सुरक्षित जीवन की ओर बढ़ रहे हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और तस्वीरों में ये बीगल कुत्ते पहली बार घास पर दौड़ते, खुले आसमान के नीचे खेलते और डरते–डरते इंसानों के करीब आते दिखाई दे रहे हैं। कई वीडियोज़ में कुछ कुत्ते पहली बार किसी इंसान की गोद में सिर रखते नज़र आए। इंटरनेट पर लोग इन तस्वीरों को “उम्मीद”, “संवेदना” और “दूसरे मौके” की कहानी बता रहे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, विस्कॉन्सिन में मौजूद Ridglan Farms नाम की फ़ैसिलिटी कई सालों से बीगल नस्ल के कुत्तों को मेडिकल प्रयोगों के लिए ब्रीड करती थी। बीगल्स को अक्सर लैब टेस्टिंग के लिए चुना जाता है क्योंकि उनका स्वभाव शांत होता है, वे जल्दी इंसानों पर भरोसा कर लेते हैं और ट्रेन करना आसान माना जाता है। लेकिन यही मासूमियत उन्हें ऐसे प्रयोगों का आसान शिकार बना देती है।
एनिमल राइट्स संगठनों का कहना है कि इन कुत्तों ने अपनी पूरी ज़िंदगी छोटे पिंजरों, सीमित रोशनी और नियंत्रित लैब माहौल में बिताई। कई कुत्तों ने कभी खुला मैदान नहीं देखा था। कुछ ने पहली बार बाहर निकलकर घास को सूंघा, तो कुछ सामान्य फर्श पर चलने से भी डरते दिखाई दिए।
इस बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन को कई संगठनों ने मिलकर अंजाम दिया। Big Dog Ranch Rescue और Center for a Humane Economy जैसे समूहों ने फ़ार्म के साथ समझौता कर इन बीगल्स को बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू की। जानकारी के अनुसार, पहले चरण में लगभग 300 कुत्तों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया, जबकि बाकी को आने वाले हफ्तों में अलग–अलग राज्यों के शेल्टर और फोस्टर होम्स में भेजा जाएगा।
रेस्क्यू टीमों के मुताबिक, इन कुत्तों को सामान्य जीवन में ढालना आसान नहीं होगा। कई बीगल्स इंसानी स्पर्श से घबरा जाते हैं। कुछ खिलौनों को देखकर डर जाते हैं क्योंकि उन्होंने कभी खेलना सीखा ही नहीं। कई कुत्तों को पानी के बर्तन, खुले दरवाज़े और सीढ़ियां तक समझ नहीं आतीं।
एक रेस्क्यू वॉलंटियर ने बताया कि जब कुछ बीगल्स को पहली बार घास पर छोड़ा गया, तो वे कुछ मिनटों तक वहीं खड़े रहे क्योंकि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि खुली जगह में कैसे चलना है। वहीं कुछ कुत्ते डर के कारण दीवार के कोनों में छिप गए। लेकिन धीरे–धीरे प्यार और देखभाल मिलने के बाद उनमें बदलाव दिखाई देने लगा।
सोशल मीडिया पर इन बीगल्स की कहानियां तेजी से वायरल हो रही हैं। कई अमेरिकी परिवार इन कुत्तों को अपनाने के लिए आगे आए हैं। कुछ लोगों ने लिखा कि वे किसी पेट शॉप से पपी खरीदने के बजाय ऐसे रेस्क्यू किए गए जानवरों को नया घर देना चाहते हैं। कई पोस्ट्स में लोगों ने कहा कि इन कुत्तों को अब वह प्यार और आज़ादी मिलनी चाहिए जिसके वे हमेशा हकदार थे।
एनिमल वेलफेयर एक्टिविस्ट्स का कहना है कि यह मामला केवल 1,500 बीगल्स का नहीं है, बल्कि उन हजारों जानवरों का प्रतीक है जो दुनिया भर में अलग–अलग रिसर्च और टेस्टिंग सिस्टम का हिस्सा बने रहते हैं। हालांकि वैज्ञानिक समुदाय का एक हिस्सा मानता है कि मेडिकल रिसर्च में कुछ टेस्टिंग अभी भी जरूरी होती है, लेकिन लगातार ऐसे विकल्प खोजे जा रहे हैं जिनमें जानवरों का इस्तेमाल कम से कम हो।
विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में लैब टेस्टिंग के खिलाफ जागरूकता काफी बढ़ी है। कई कंपनियां अब cruelty-free प्रोडक्ट्स और वैकल्पिक रिसर्च तकनीकों की ओर बढ़ रही हैं। ऐसे में यह रेस्क्यू ऑपरेशन सिर्फ एक भावनात्मक घटना नहीं, बल्कि बदलती सोच का भी संकेत माना जा रहा है।
रेस्क्यू संगठनों ने लोगों से अपील की है कि अगर वे इन जानवरों की मदद करना चाहते हैं, तो फोस्टर प्रोग्राम, डोनेशन और एनिमल एडॉप्शन को बढ़ावा दें। कई शेल्टर्स ने बताया कि इन बीगल्स को प्यार, धैर्य और समय की सबसे ज्यादा जरूरत होगी ताकि वे धीरे–धीरे एक सामान्य जीवन जीना सीख सकें।
फिलहाल, इन बीगल्स की मासूम आंखें और आज़ादी के बाद के पहले कदम दुनिया भर के लोगों को भावुक कर रहे हैं। जो कुत्ते कभी लैब की बंद दीवारों में कैद थे, वे अब खुली हवा में सांस ले रहे हैं। इंटरनेट पर लोग इसे “नई जिंदगी की शुरुआत” और “इंसानियत की जीत” बता रहे हैं।
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