जयपुर के पास स्थित लापोड़िया गांव कभी सूखे, पलायन और बंजर जमीन की पहचान था। लेकिन गांववालों और सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मण सिंह की दशकों लंबी मेहनत ने इसे आज राजस्थान के सबसे सफल वाटर मैनेजमेंट मॉडल में बदल दिया है।
राजस्थान का नाम आते ही अक्सर लोगों के दिमाग में रेगिस्तान, पानी की कमी और सूखे की तस्वीर उभरती है। लेकिन इसी रेगिस्तानी प्रदेश में एक ऐसा गांव भी मौजूद है जिसने पानी की हर बूंद को बचाकर अपनी किस्मत बदल दी। जयपुर से करीब दो घंटे की दूरी पर स्थित लापोड़िया गांव आज देशभर में “सूखा–मुक्त गांव” और “ग्रीन ओएसिस” के नाम से जाना जाता है। कभी यहां के लोग पानी के लिए तरसते थे, खेत सूखे पड़े रहते थे और रोजगार की तलाश में गांव छोड़कर शहरों की तरफ पलायन करना मजबूरी बन चुकी थी। लेकिन आज यही गांव देश के लिए एक मिसाल बन चुका है।
लापोड़िया की कहानी सिर्फ पानी बचाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह सामूहिक मेहनत, स्थानीय सोच और लगातार प्रयास की ताकत का उदाहरण भी है। इस बदलाव के केंद्र में रहे सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मण सिंह, जिन्होंने 1970 के दशक के आखिर में गांव की हालत बदलने का फैसला किया। उस समय गांव में पानी का स्तर लगातार गिर रहा था। पुराने तालाब सूख चुके थे, चारागाह खत्म हो रहे थे और खेती लगभग बर्बाद हो चुकी थी। गांव के ज्यादातर परिवारों की आय सीमित थी और लोग बेहतर जिंदगी की तलाश में बड़े शहरों की तरफ जा रहे थे।
साल 1977 में लक्ष्मण सिंह ने स्कूल छोड़कर गांव के पुराने जलस्रोतों को फिर से जिंदा करने का काम शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी। गांव के कई लोगों को भरोसा नहीं था कि सूखे इलाके में पानी वापस लाया जा सकता है। लेकिन धीरे–धीरे लोगों ने उनकी सोच को समझा और गांव के युवाओं ने मिलकर तालाबों की सफाई, मिट्टी संरक्षण और पारंपरिक जल संरचनाओं को दोबारा तैयार करना शुरू किया।
इसी दौरान लापोड़िया में “चोखा प्रणाली” की शुरुआत हुई, जिसने पूरे गांव की तस्वीर बदल दी। इस तकनीक के तहत खेतों और चारागाहों में छोटे–छोटे चौकोर गड्ढे बनाए जाते हैं। बारिश का पानी इन गड्ढों में जमा होता है और धीरे–धीरे मिट्टी के अंदर रिसता चला जाता है। जब एक गड्ढा भर जाता है तो अतिरिक्त पानी अगले गड्ढे में पहुंचता है और आखिर में तालाबों तक जाता है। इस पूरी व्यवस्था ने जमीन को प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करने लायक बना दिया।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें पानी को सिर्फ स्टोर नहीं किया जाता, बल्कि जमीन के भीतर पहुंचाकर भूजल स्तर को भी मजबूत किया जाता है। यही वजह है कि लापोड़िया में लंबे समय तक कम बारिश होने के बावजूद पानी की स्थिति पूरी तरह संकट में नहीं पहुंचती। गांव के लोग बताते हैं कि अगर लगातार दो–तीन साल तक बारिश कम भी हो जाए, तब भी यहां पीने के पानी और खेती की बुनियादी जरूरतें पूरी हो जाती हैं।
पानी लौटने के साथ ही गांव की जमीन भी बदलने लगी। जहां कभी सूखी मिट्टी और धूल उड़ती थी, वहां अब हरियाली दिखाई देने लगी। चारागाह दोबारा विकसित हुए, जिससे पशुपालन मजबूत हुआ। पहले जहां पशुओं के लिए चारा जुटाना मुश्किल था, वहीं अब गांव में पर्याप्त घास उपलब्ध रहती है। खेती में भी बड़ा बदलाव आया। किसानों ने दोबारा फसलें उगानी शुरू कीं और उनकी आमदनी में धीरे–धीरे सुधार होने लगा।
लापोड़िया मॉडल का असर सामाजिक स्तर पर भी देखने को मिला। पलायन कम हुआ और गांव के लोग वापस खेती और पशुपालन से जुड़ने लगे। महिलाओं को पानी लाने के लिए कई किलोमीटर दूर नहीं जाना पड़ता। गांव में सामुदायिक भागीदारी भी मजबूत हुई। यहां जल संरक्षण सिर्फ सरकारी योजना नहीं, बल्कि लोगों की सामूहिक जिम्मेदारी बन गया।
इस मॉडल की सफलता ने देश और विदेश के विशेषज्ञों का ध्यान भी खींचा। कई पर्यावरण विशेषज्ञ और रिसर्च संस्थान लापोड़िया को “कम्युनिटी बेस्ड वाटर मैनेजमेंट” का सफल उदाहरण मानते हैं। राजस्थान के 100 से ज्यादा गांव इस मॉडल को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। कई जगहों पर स्थानीय समुदायों को ट्रेनिंग दी जा रही है ताकि वे अपने इलाके में भी इसी तरह पानी संरक्षण का काम कर सकें।
लापोड़िया की सबसे बड़ी सीख यही है कि जल संकट का समाधान हमेशा बड़े डैम, लंबी पाइपलाइन या भारी बजट वाली योजनाओं में ही नहीं छिपा होता। कई बार छोटे–छोटे स्थानीय प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। गांव के लोगों ने दिखाया कि अगर समुदाय एकजुट होकर लगातार काम करे, तो रेगिस्तान जैसी कठिन परिस्थितियों में भी पानी और हरियाली वापस लाई जा सकती है।
आज जब देश के कई शहर और गांव पानी की कमी से जूझ रहे हैं, तब लापोड़िया एक उम्मीद की तरह सामने आता है। यह गांव बताता है कि जल संरक्षण सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि भविष्य बचाने की जरूरत है। अगर एक छोटा गांव दशकों की मेहनत से खुद को सूखा–मुक्त बना सकता है, तो बड़े शहर भी अपने तालाब, झीलें और रेनवॉटर सिस्टम को बचाकर आने वाले संकट को कम कर सकते हैं।
लापोड़िया की कहानी इस बात का सबूत है कि बदलाव संभव है—जरूरत सिर्फ इरादे, सामूहिक भागीदारी और लगातार प्रयास की है।
Published by: Netgram Team. For newsroom standards, byline transparency, and correction requests, review our editorial standards and corrections policy.
Need to contact the newsroom directly? Email netgramnews@gmail.com or visit the team page.