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राजस्थान के झुंझुनू ज़िले के लांबी–आहिर गांव में ग्रामीणों ने मिलकर 70 फ़ुट ऊंचा बर्ड टॉवर तैयार किया है, जहां रोज़ करीब 2000 से ज़्यादा पक्षी आते हैं। यह पहल अब सोशल मीडिया पर “Small village, big heart” के नाम से लोगों को प्रेरित कर रही है।
राजस्थान का नाम आते ही अक्सर सूखा, पानी की कमी और गांवों से पलायन जैसी तस्वीरें सामने आती हैं। लेकिन झुंझुनू ज़िले का छोटा सा गांव लांबी–आहिर इन दिनों एक अलग वजह से चर्चा में है। यहां के लोगों ने ऐसा काम किया है, जिसने सिर्फ इंसानों ही नहीं बल्कि हजारों पक्षियों के लिए भी उम्मीद की नई जगह तैयार कर दी है। गांव में बनाया गया 70 फ़ुट ऊंचा “बर्ड टॉवर” अब करीब 2000 से ज्यादा पक्षियों का नया घर बन चुका है।
सोशल मीडिया पर इस पहल को “Small village, big heart” कैप्शन के साथ जमकर शेयर किया जा रहा है। वजह भी खास है, क्योंकि जिस दौर में शहरों और गांवों में तेजी से कंक्रीट बढ़ रही है और पक्षियों के रहने की जगह कम होती जा रही है, उस समय एक छोटे गांव ने प्रकृति के साथ रिश्ता बचाने की मिसाल पेश की है।
ग्रामीणों और पंचायत के सहयोग से बनाए गए इस टॉवर में सैकड़ों छोटे–बड़े घोंसले लगाए गए हैं। इसके अलावा पक्षियों के बैठने के लिए अलग–अलग स्तरों पर लकड़ी और लोहे के स्ट्रक्चर बनाए गए हैं। नीचे की तरफ पानी के बड़े बर्तन और वाटर ट्रफ लगाए गए हैं ताकि गर्मी के मौसम में पक्षियों को पानी की परेशानी न हो।
गांव के लोगों का कहना है कि पहले इलाके में गौरैया, मैना और तोते जैसे पक्षी कम दिखाई देने लगे थे। पुराने पेड़ कट रहे थे, कच्चे घरों की जगह पक्के मकान बन रहे थे और खुले आंगन खत्म होते जा रहे थे। ऐसे में पक्षियों के लिए सुरक्षित जगहें लगातार कम होती गईं। इसी चिंता से गांव में चर्चा शुरू हुई कि अगर इंसानों के लिए पार्क और कॉलोनियां बन सकती हैं, तो पक्षियों के लिए भी कुछ क्यों नहीं किया जा सकता।
Continue Reading25 मई 2026
धीरे–धीरे यह सोच एक बड़े अभियान में बदल गई। गांव के लोगों ने मिलकर फंड जुटाया, मजदूरी में सहयोग दिया और आखिरकार 70 फ़ुट ऊंचा बर्ड टॉवर तैयार किया गया। शुरुआत में लोगों को लगा कि शायद पक्षी यहां नहीं आएंगे, लेकिन कुछ ही महीनों में यह टॉवर चहचहाहट से भर गया।
लोकल सोशल मीडिया रिपोर्ट्स और वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि शाम होते ही सैकड़ों पक्षी एक साथ टॉवर पर लौटते हैं। पूरा इलाका पक्षियों की आवाज़ों से गूंज उठता है। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि कई साल बाद अब फिर से सुबह गौरैया की आवाज़ सुनाई देने लगी है।
इस टॉवर की सबसे खास बात सिर्फ इसका आकार नहीं, बल्कि इसकी देखभाल का तरीका भी है। गांव वाले बारी–बारी से इसकी सफाई करते हैं। पानी के बर्तनों को रोज़ भरा जाता है और घोंसलों की निगरानी भी की जाती है ताकि कोई नुकसान न हो। यह पूरी पहल किसी बड़ी सरकारी योजना का हिस्सा नहीं, बल्कि लोगों की सामूहिक सोच और जिम्मेदारी का परिणाम है।
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पर्यावरण से जुड़े एक्टिविस्ट्स का कहना है कि इस तरह के मॉडल आने वाले समय में बेहद जरूरी हो सकते हैं। तेजी से बदलते शहरों और गांवों में पक्षियों का नैचुरल हैबिटैट खत्म हो रहा है। कंक्रीट की इमारतों में न तो घोंसले बनाने की जगह बचती है और न ही पर्याप्त पेड़। ऐसे में कृत्रिम लेकिन सुरक्षित संरचनाएं पक्षियों के लिए राहत बन सकती हैं।
लांबी–आहिर का यह बर्ड टॉवर अब बच्चों के लिए भी सीखने का केंद्र बन गया है। गांव के स्कूलों के बच्चे यहां आकर अलग–अलग पक्षियों को पहचानना सीख रहे हैं। उन्हें बायोडायवर्सिटी और पर्यावरण संरक्षण के बारे में समझाया जा रहा है। गांव के कई लोग इसे सिर्फ एक टॉवर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए “प्रकृति का पाठशाला” मानते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इस पहल ने सोशल मीडिया पर भी लोगों का ध्यान खींचा है। कई यूजर्स इसे “इंसान और प्रकृति के बीच दोस्ती की मिसाल” बता रहे हैं। कुछ लोग इसे देश के दूसरे गांवों और शहरों में भी अपनाने की मांग कर रहे हैं।
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विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हर शहर और गांव अपने स्तर पर छोटे–छोटे प्रयास शुरू करे, तो पक्षियों और दूसरे जीवों के लिए बेहतर सुरक्षित माहौल तैयार किया जा सकता है। पर्यावरण संरक्षण हमेशा बड़े प्रोजेक्ट्स से ही नहीं होता, बल्कि कई बार छोटे समुदायों की पहल भी बड़ा बदलाव ला सकती है। लांबी–आहिर गांव का यह बर्ड टॉवर इसी सोच का उदाहरण बनकर सामने आया है।
आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और घटती जैव विविधता जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब राजस्थान के इस छोटे से गांव ने दिखाया है कि इंसान अगर चाहे तो विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। यह पहल सिर्फ पक्षियों को आश्रय देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों को प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी याद दिलाती है। फिलहाल लांबी–आहिर का यह अनोखा बर्ड टॉवर सोशल मीडिया से लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों तक चर्चा का विषय बना हुआ है। गांव के लोग उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी यह कोशिश दूसरे इलाकों को भी प्रेरित करेगी, ताकि आने वाले समय में पक्षियों की चहचहाहट सिर्फ यादों तक सीमित न रह जाए।
Disclaimer:
Images are for illustrative purposes only and some editing of images done by using AI.
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25 मई 2026