दिल्ली में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बीच हुई हाई-लेवल बातचीत में ऊर्जा सुरक्षा, वीज़ा नियम, व्यापार तनाव और मध्य पूर्व संकट जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। दोनों देशों ने रिश्तों में बढ़ती दूरी के बीच भरोसा बहाल करने की कोशिश का संकेत दिया।
नई दिल्ली में रविवार को भारत और अमेरिका के रिश्तों को लेकर एक बेहद अहम कूटनीतिक बैठक देखने को मिली। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने अपनी चार दिन की भारत यात्रा के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ लंबी और विस्तृत बातचीत की। यह मुलाक़ात ऐसे समय पर हुई है जब पिछले कुछ महीनों में व्यापार, वीज़ा नियमों और वैश्विक रणनीतिक मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव की खबरें लगातार सामने आ रही थीं।
दिल्ली में हुई इस बैठक को सिर्फ एक सामान्य डिप्लोमैटिक मीटिंग नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भारत–अमेरिका रिश्तों में बढ़ती “ट्रस्ट गैप” को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। बातचीत के दौरान ऊर्जा सुरक्षा, ईरान–अमेरिका तनाव, बंद पड़े होरमुज़ जलडमरूमध्य, इंडो–पैसिफ़िक क्षेत्र की समुद्री सुरक्षा, व्यापार टैरिफ़, रूसी तेल खरीद और भारतीय छात्रों व IT प्रोफेशनल्स के वीज़ा मुद्दे जैसे कई संवेदनशील विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।
सूत्रों के मुताबिक, अमेरिकी पक्ष ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत अमेरिका का एक अहम रणनीतिक साझेदार है और दोनों देशों के रिश्तों को मज़बूत बनाए रखना वॉशिंगटन की प्राथमिकता है। मार्को रूबियो ने बातचीत के दौरान यह भी दोहराया कि ट्रम्प प्रशासन भारत के साथ दीर्घकालिक सहयोग को लेकर प्रतिबद्ध है।
इस बैठक की टाइमिंग भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हाल ही में ईरान पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और होरमुज़ स्ट्रेट में बढ़ती सैन्य गतिविधियों के कारण पूरी दुनिया में कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। भारत, जो अपनी ज़रूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से तेल आयात करता है, उसके लिए यह स्थिति सीधे आर्थिक दबाव पैदा कर सकती है। अगर मध्य पूर्व में हालात और बिगड़ते हैं तो पेट्रोल–डीज़ल की कीमतों के साथ-साथ घरेलू गैस सिलेंडर और ट्रांसपोर्ट कॉस्ट भी प्रभावित हो सकती है।
बैठक में भारत ने ऊर्जा सप्लाई की स्थिरता को लेकर अपनी चिंता साफ़ तौर पर अमेरिका के सामने रखी। भारत का मानना है कि वैश्विक तनाव का असर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर सबसे ज़्यादा पड़ता है। यही वजह है कि नई दिल्ली लगातार तेल सप्लाई रूट सुरक्षित रखने और वैश्विक बाज़ार में स्थिरता बनाए रखने पर ज़ोर दे रहा है।
दूसरी तरफ़ वीज़ा और इमिग्रेशन का मुद्दा भी बातचीत का बड़ा केंद्र रहा। पिछले कुछ महीनों में अमेरिका ने भारतीय छात्रों, H-1B वीज़ा धारकों और IT सेक्टर से जुड़े प्रोफेशनल्स के लिए नियमों को पहले से ज़्यादा सख्त किया है। भारतीय उद्योग जगत और टेक कंपनियों ने कई बार चिंता जताई कि इससे भारतीय युवाओं और कंपनियों पर सीधा असर पड़ रहा है।
दिल्ली की बैठक में भारत ने साफ़ कहा कि दोनों देशों के बीच लोगों का आपसी संपर्क रिश्तों की सबसे मज़बूत नींव है, इसलिए वीज़ा प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से कठिन नहीं बनाया जाना चाहिए। माना जा रहा है कि अमेरिका ने इस मामले में कुछ प्रक्रियात्मक सुधारों पर सकारात्मक संकेत दिए हैं, हालांकि किसी बड़े बदलाव की आधिकारिक घोषणा अभी नहीं हुई है।
जानकारों के मुताबिक, अमेरिका इस समय चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी बनाए रखना चाहता है। इंडो–पैसिफ़िक क्षेत्र में चीन की आक्रामक गतिविधियों को लेकर अमेरिका और भारत दोनों की चिंताएं काफी हद तक समान हैं। इसी वजह से रक्षा, टेक्नोलॉजी, समुद्री सुरक्षा और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा हुई।
सूत्रों का कहना है कि रूबियो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए वॉशिंगटन आने का निमंत्रण भी सौंपा। माना जा रहा है कि व्हाइट हाउस स्तर पर एक हाई-प्रोफाइल मुलाक़ात के जरिए दोनों देश दुनिया को यह संदेश देना चाहते हैं कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद रणनीतिक रिश्ते कमजोर नहीं हुए हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और अमेरिका दोनों एक-दूसरे की ज़रूरत भी हैं और चुनौती भी। अमेरिका को एशिया में एक मज़बूत लोकतांत्रिक साझेदार चाहिए, जबकि भारत को टेक्नोलॉजी, निवेश, रक्षा और वैश्विक मंचों पर समर्थन की आवश्यकता है। लेकिन व्यापार शुल्क, रूस से तेल खरीद और इमिग्रेशन नीति जैसे मुद्दे समय-समय पर रिश्तों में तनाव पैदा करते रहते हैं।
आम भारतीय नागरिकों के लिए भी इस तरह की बैठकों का असर काफी बड़ा होता है। अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो रोज़मर्रा की ज़िंदगी महंगी हो जाती है। डॉलर मज़बूत होने पर आयात महंगे हो जाते हैं और इसका असर मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरे सामानों की कीमतों पर भी दिखाई देता है। वहीं लाखों भारतीय छात्र और IT प्रोफेशनल अमेरिका की वीज़ा नीतियों पर सीधे निर्भर हैं।
दिल्ली में हुई यह बातचीत इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि यह सिर्फ दो नेताओं की मुलाक़ात नहीं थी, बल्कि दो बड़े वैश्विक साझेदारों के बीच भरोसे को फिर से मजबूत करने की कोशिश थी। आने वाले महीनों में यह साफ़ होगा कि इस बैठक के बाद भारत–अमेरिका रिश्तों में नई गर्मजोशी आती है या फिर तनाव के मुद्दे आगे भी बने रहते हैं।
Published by: Netgram Team . For newsroom standards, byline transparency, and correction requests, review our editorial standards and corrections policy.
Need to contact the newsroom directly? Email netgramnews@gmail.com or visit the team page.