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भारत में हाईवे सफर को तेज और आसान बनाने के लिए बैरियर-लेस टोलिंग सिस्टम की शुरुआत हो गई है। इस नई तकनीक के जरिए वाहन बिना रुके टोल प्लाज़ा पार करेंगे और टोल राशि अपने-आप खाते से कट जाएगी।
भारत के सड़क और हाईवे नेटवर्क में अब एक बड़ा तकनीकी बदलाव देखने को मिल रहा है। देश में “बैरियर-लेस टोलिंग” सिस्टम की शुरुआत हो चुकी है, जिसे भविष्य की स्मार्ट ट्रैफिक व्यवस्था की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। इस नए मॉडल का उद्देश्य टोल प्लाज़ा पर लगने वाले लंबे जाम को खत्म करना और वाहनों की आवाजाही को पहले से ज्यादा तेज और सुगम बनाना है।
नई व्यवस्था के तहत अब वाहनों को टोल प्लाज़ा पर रुकने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वाहन तय स्पीड पर सीधे गुजरेंगे और सिस्टम अपने-आप वाहन की पहचान करके संबंधित खाते से टोल राशि काट लेगा। माना जा रहा है कि यह मौजूदा फास्टैग सिस्टम का एडवांस्ड और ज्यादा स्मार्ट वर्जन है, जो आने वाले समय में पूरे देश के हाईवे नेटवर्क को बदल सकता है।
पिछले कई वर्षों से देशभर के टोल प्लाज़ा पर भारी ट्रैफिक, लंबी कतारें और समय की बर्बादी एक बड़ी समस्या बनी हुई थी। खासतौर पर त्योहारों, छुट्टियों और व्यस्त रूट्स पर कई-कई किलोमीटर लंबे जाम देखने को मिलते थे। इससे यात्रियों को परेशानी होती थी, वहीं ट्रांसपोर्ट सेक्टर को भी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता था। अब सरकार इस नई तकनीक के जरिए इन समस्याओं को कम करने की कोशिश कर रही है।
Continue Reading22 मई 2026
बैरियर-लेस टोलिंग सिस्टम में हाई-टेक कैमरे, सेंसर और ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। जैसे ही कोई वाहन टोल ज़ोन से गुजरेगा, कैमरे उसकी नंबर प्लेट को स्कैन करेंगे और सिस्टम वाहन से जुड़े बैंक या फास्टैग अकाउंट से टोल राशि काट देगा। पूरी प्रक्रिया कुछ सेकंड में पूरी हो जाएगी और वाहन को अपनी स्पीड कम करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक से सबसे बड़ा फायदा समय की बचत के रूप में देखने को मिलेगा। अभी कई जगहों पर टोल पार करने में 10 से 20 मिनट तक लग जाते हैं, लेकिन बैरियर-फ्री सिस्टम लागू होने के बाद यह प्रक्रिया लगभग बिना रुके पूरी हो सकेगी। इससे यात्रियों का सफर ज्यादा आरामदायक और स्मूथ बनेगा।
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इसके अलावा फ्यूल की बचत भी इस मॉडल का बड़ा फायदा मानी जा रही है। टोल प्लाज़ा पर बार-बार ब्रेक लगाने और गाड़ी रोकने से ईंधन की खपत बढ़ जाती है। लाखों वाहन रोजाना टोल प्लाज़ा से गुजरते हैं, ऐसे में यदि रुकावट कम होगी तो ईंधन की बड़ी बचत संभव है। इसका असर पर्यावरण पर भी सकारात्मक रूप से पड़ सकता है, क्योंकि वाहनों से निकलने वाला धुआं और कार्बन उत्सर्जन कम होगा।
लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट सेक्टर के लिए भी यह बदलाव काफी अहम माना जा रहा है। ट्रकों और कमर्शियल वाहनों को अक्सर टोल प्लाज़ा पर लंबा इंतजार करना पड़ता था, जिससे डिलीवरी टाइम प्रभावित होता था। अब तेज मूवमेंट की वजह से ट्रकों का टर्नअराउंड टाइम घट सकता है। इससे ट्रांसपोर्ट कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट कम होगी और सामान की सप्लाई चेन पहले से ज्यादा तेज हो सकेगी।
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सरकार का मानना है कि यदि यह मॉडल सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में देशभर के अधिकतर हाईवे और एक्सप्रेसवे पर इसे लागू किया जा सकता है। शुरुआत में इसे चुनिंदा रूट्स और पायलट प्रोजेक्ट्स के तौर पर लागू किया जा रहा है, ताकि सिस्टम की कार्यक्षमता और तकनीकी चुनौतियों को समझा जा सके।
हालांकि इस नई तकनीक के सामने कुछ चुनौतियाँ भी मौजूद हैं।
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21 मई 2026