हाल ही में पृथ्वी ने अपनी धुरी पर सामान्य समय से थोड़ा तेज़ घूमते हुए इस साल का दूसरा सबसे छोटा दिन दर्ज किया। वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले महीनों में भी कुछ दिनों की लंबाई बेहद मामूली रूप से कम हो सकती है, हालांकि इसका असर आम लोगों की जिंदगी पर महसूस नहीं होगा।
धरती की रफ्तार इन दिनों वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ा चर्चा का विषय बनी हुई है। हाल ही में सामने आई एक वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी ने अपनी धुरी पर सामान्य समय से थोड़ा तेज़ घूमते हुए इस साल का दूसरा सबसे छोटा दिन रिकॉर्ड किया। वैज्ञानिकों के मुताबिक उस दिन पृथ्वी ने अपना एक पूरा चक्कर लगभग एक हज़ारवें सेकंड की तेजी से पूरा किया। सुनने में यह अंतर बेहद छोटा लगता है, लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों के लिए यह बदलाव काफी अहम माना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर हम एक दिन को 24 घंटे का मानते हैं, लेकिन वास्तव में पृथ्वी की घूर्णन गति हर समय बिल्कुल एक जैसी नहीं रहती। कभी यह थोड़ा धीमी होती है तो कभी थोड़ी तेज़। यही वजह है कि वैज्ञानिक लगातार परमाणु घड़ियों और अंतरिक्ष से मिलने वाले डेटा के जरिए पृथ्वी की गति पर नजर बनाए रखते हैं।
साइंस से जुड़ी एक बच्चों की वेबसाइट पर प्रकाशित जानकारी के अनुसार वैज्ञानिकों ने चेतावनी नहीं बल्कि दिलचस्प संभावना जताई है कि इस गर्मी के मौसम में कुछ और दिन भी ऐसे आ सकते हैं जब पृथ्वी सामान्य से थोड़ी ज्यादा तेज़ घूमे। इससे दिन की कुल लंबाई में बेहद मामूली कमी दर्ज की जा सकती है। हालांकि यह बदलाव इतना छोटा होगा कि इंसान इसे महसूस नहीं कर पाएगा।
वैज्ञानिक बताते हैं कि पृथ्वी की घूर्णन गति कई प्राकृतिक कारणों से प्रभावित होती है। इसमें सबसे बड़ा असर चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण का माना जाता है। चंद्रमा की वजह से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है और यही ज्वारीय प्रभाव पृथ्वी की गति पर हल्का असर डालता है। इसके अलावा पृथ्वी के भीतर मौजूद द्रव लौह कोर की गतिविधियां भी घूर्णन में छोटे-छोटे बदलाव पैदा कर सकती हैं।
इतना ही नहीं, जलवायु परिवर्तन भी इस प्रक्रिया से जुड़ा हुआ माना जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और पृथ्वी पर पानी के वितरण में बदलाव से भी ग्रह के घूमने की गति प्रभावित हो सकती है। जब पृथ्वी के किसी हिस्से में द्रव्यमान का संतुलन बदलता है तो उसका असर पूरे ग्रह की घूर्णन प्रणाली पर पड़ सकता है। इसी वजह से वैज्ञानिक पृथ्वी की जलवायु, महासागरों और आंतरिक संरचना से जुड़े डेटा का लगातार अध्ययन कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पृथ्वी की रफ्तार में होने वाले ये सूक्ष्म बदलाव सिर्फ वैज्ञानिक जिज्ञासा का विषय नहीं हैं, बल्कि आधुनिक तकनीक के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। GPS सिस्टम, सैटेलाइट नेटवर्क, इंटरनेट टाइमिंग और अंतरराष्ट्रीय संचार व्यवस्था बेहद सटीक समय मापन पर निर्भर करती है। अगर पृथ्वी की घूर्णन गति में बदलाव होता है, तो वैज्ञानिकों को परमाणु घड़ियों के समय के साथ उसका संतुलन बनाए रखना पड़ता है। इसी कारण समय-समय पर “लीप सेकंड” जोड़ने या हटाने जैसी प्रक्रियाओं पर भी चर्चा होती रहती है। लीप सेकंड वह अतिरिक्त सेकंड होता है जिसे वैश्विक समय प्रणाली में जोड़ा जाता है ताकि पृथ्वी की वास्तविक घूर्णन गति और परमाणु समय के बीच तालमेल बना रहे। हालांकि हाल के वर्षों में पृथ्वी के तेज़ घूमने की वजह से वैज्ञानिक “नेगेटिव लीप सेकंड” जैसी संभावना पर भी विचार कर रहे हैं, जो अब तक कभी इस्तेमाल नहीं किया गया है। वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि फिलहाल लोगों को घबराने की कोई जरूरत नहीं है। पृथ्वी की गति में यह बदलाव बेहद मामूली है और इसका इंसानी जीवन पर सीधे तौर पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यह घटना सिर्फ इस बात का उदाहरण है कि हमारा ग्रह एक पूरी तरह स्थिर प्रणाली नहीं है, बल्कि इसके भीतर और बाहर लगातार कई प्राकृतिक प्रक्रियाएं काम करती रहती हैं। धरती की यह बदलती रफ्तार वैज्ञानिकों के लिए ब्रह्मांड और ग्रहों की कार्यप्रणाली को समझने का एक महत्वपूर्ण जरिया बन गई है। आने वाले समय में और भी आधुनिक उपकरणों तथा अंतरिक्ष मिशनों की मदद से वैज्ञानिक पृथ्वी की इन सूक्ष्म गतिविधियों का और गहराई से अध्ययन करेंगे।
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