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राजस्थान हाई कोर्ट ने न्याय प्रक्रिया को तेज़ और आसान बनाने के लिए URN (Uniform Registration Number) सिस्टम, वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग और WhatsApp आधारित “सुलह” मॉडल जैसी डिजिटल पहलें शुरू की हैं। अब हर केस को एक यूनिक नंबर मिलेगा, जिससे उसकी ट्रैकिंग और जानकारी आसान होगी। दूरदराज़ के लोग VC Remote Points के जरिए ऑनलाइन सुनवाई में शामिल हो सकेंगे। वहीं छोटे विवादों को WhatsApp mediation के जरिए कोर्ट के बाहर सुलझाने की कोशिश होगी। इन सुधारों का उद्देश्य अदालतों का बोझ कम करना, पारदर्शिता बढ़ाना और आम लोगों को जल्दी न्याय दिलाना है।
राजस्थान में न्याय व्यवस्था को तेज़, पारदर्शी और आम लोगों के लिए आसान बनाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव शुरू हुआ है। राजस्थान हाई कोर्ट ने हाल ही में कई डिजिटल सुधार लागू किए हैं, जिनमें सबसे ज्यादा चर्चा Uniform Registration Number (URN) सिस्टम, वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग आधारित सुनवाई और WhatsApp आधारित “सुलह” मॉडल की हो रही है। इन पहलों का उद्देश्य सिर्फ अदालतों को आधुनिक बनाना नहीं, बल्कि आम नागरिक को न्याय तक आसान पहुंच देना भी है।
जोधपुर और जयपुर बेंच के लिए जारी नोटिफिकेशन और “Best Practices for Expeditious Disposal of Cases” दस्तावेज़ के अनुसार अब मामलों की पहचान और ट्रैकिंग के लिए एक यूनिफॉर्म नंबर सिस्टम लागू किया जा रहा है। यानी किसी केस के लिए अलग-अलग फाइल नंबर, पुरानी एंट्री या विभागीय कोड के बजाय एक ही यूनिक नंबर से पूरे केस की जानकारी ट्रैक की जा सकेगी। यह बदलाव सुनने में तकनीकी लग सकता है, लेकिन इसका असर सीधे उस आम व्यक्ति पर पड़ेगा जो सालों तक अदालतों के चक्कर काटता है।
क्या है URN सिस्टम और क्यों है यह महत्वपूर्ण?
URN यानी Uniform Registration Number एक ऐसा यूनिक नंबर होगा जो किसी भी केस की स्थायी डिजिटल पहचान बनेगा। अभी तक कई बार अलग-अलग स्तरों पर केस नंबर बदलने, डुप्लीकेट एंट्री या फाइलिंग त्रुटियों के कारण भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती थी। कई मामलों में पक्षकारों को यह समझना मुश्किल होता था कि उनका केस किस स्टेज पर है।
नए सिस्टम में एक यूनिक नंबर से ही केस की पूरी हिस्ट्री, अगली तारीख, संबंधित दस्तावेज़ और प्रक्रिया को ट्रैक किया जा सकेगा। इससे अदालतों में रिकॉर्ड प्रबंधन आसान होगा और मानवीय भूलों की संभावना कम होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिस्टम लंबे समय में केस मैनेजमेंट को अधिक व्यवस्थित बनाएगा। अदालतों में लंबित मामलों की संख्या पहले से ही बड़ी चुनौती है। ऐसे में डिजिटल ट्रैकिंग और एकीकृत रिकॉर्ड सिस्टम न्यायिक प्रक्रिया को तेज़ करने में मदद कर सकता है।
छोटे शहरों और गांवों के लोगों को सबसे ज्यादा फायदा
राजस्थान भौगोलिक रूप से बहुत बड़ा राज्य है। जोधपुर जैसे बड़े जिले के आसपास कई छोटे कस्बे और गांव आते हैं, जहां से हाई कोर्ट तक पहुंचना आसान नहीं होता। कई लोगों को सिर्फ एक तारीख या दस्तावेज़ जमा करने के लिए पूरा दिन यात्रा में निकालना पड़ता है।
वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग और “VC Remote Points” की व्यवस्था इसी समस्या को कम करने के लिए बनाई गई है। अब दूरदराज़ इलाकों के वकील और पक्षकार डिजिटल माध्यम से हाई कोर्ट की कार्यवाही में शामिल हो सकेंगे।
Continue Reading23 मई 2026
महामारी के दौरान कोर्टों ने वीडियो सुनवाई का इस्तेमाल मजबूरी में शुरू किया था, लेकिन राजस्थान हाई कोर्ट ने इसे स्थायी व्यवस्था में बदलने की दिशा में काम किया है। अदालत द्वारा जारी revised SOPs इस बात का संकेत हैं कि भविष्य की न्याय प्रणाली में डिजिटल भागीदारी अहम भूमिका निभाने वाली है।
इसका सबसे बड़ा लाभ उन लोगों को मिलेगा जो आर्थिक या भौगोलिक कारणों से बार-बार कोर्ट नहीं पहुंच पाते। इससे समय और पैसे दोनों की बचत होगी।
WhatsApp से होगा “सुलह” का प्रयास
राजस्थान हाई कोर्ट की सबसे दिलचस्प पहल “SULAH WhatsApp Chat Bot” मानी जा रही है। इसका उद्देश्य छोटे विवादों को लंबी कानूनी लड़ाई में बदलने से पहले आपसी समझौते के जरिए हल करना है।
मेडिएशन यानी मध्यस्थता पहले से न्याय व्यवस्था का हिस्सा रही है, लेकिन आम लोगों तक इसकी पहुंच सीमित थी। अब WhatsApp जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर लोगों को आसानी से mediation प्रक्रिया से जोड़ा जाएगा।
अगर किसी विवाद को अदालत के बाहर समझौते से हल किया जा सकता है, तो पक्षकार WhatsApp आधारित सुलह मॉडल के जरिए जानकारी और सहायता प्राप्त कर सकेंगे। इससे अदालतों पर बोझ कम होगा और लोगों को जल्दी समाधान मिलने की संभावना बढ़ेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे पारिवारिक विवाद, किराया विवाद, लेन-देन के मामले और स्थानीय झगड़े अक्सर वर्षों तक अदालतों में फंसे रहते हैं। अगर इनमें से कुछ मामलों का समाधान शुरुआती स्तर पर ही हो जाए तो न्यायिक प्रणाली पर दबाव काफी घट सकता है।
डिजिटल न्याय व्यवस्था की तरफ बड़ा कदम
Continue Reading23 मई 2026
भारत में अदालतों पर मामलों का भारी बोझ लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। लाखों केस वर्षों से लंबित हैं। ऐसे में तकनीक का इस्तेमाल अब सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि आवश्यकता बन गया है।
राजस्थान हाई कोर्ट का यह मॉडल बताता है कि तकनीक का सही उपयोग न्याय को अधिक सुलभ बना सकता है। मोबाइल फोन, वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग और ऑनलाइन ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं अदालतों को आम नागरिक के करीब ला रही हैं।
डिजिटल सिस्टम का एक और बड़ा फायदा पारदर्शिता है। पहले केस की स्थिति जानने के लिए लोगों को वकील या कोर्ट स्टाफ पर निर्भर रहना पड़ता था। अब धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था बन रही है जिसमें पक्षकार खुद अपने मोबाइल पर जानकारी देख सकेंगे।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि यह बदलाव सकारात्मक माना जा रहा है, लेकिन इसके सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल साक्षरता अभी भी बड़ी समस्या है। कई लोगों को ऑनलाइन सिस्टम इस्तेमाल करना नहीं आता।
इसके अलावा अदालतों के कर्मचारियों और वकीलों को भी नई तकनीक के अनुसार ट्रेनिंग की जरूरत होगी। अगर सिस्टम सही तरीके से लागू नहीं हुआ तो तकनीकी दिक्कतें लोगों के लिए नई परेशानी भी बन सकती हैं।
साइबर सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। अदालतों के रिकॉर्ड बेहद संवेदनशील होते हैं, इसलिए डिजिटल प्लेटफॉर्म को सुरक्षित रखना जरूरी होगा।
आम आदमी के लिए क्या बदलेगा?
Continue Reading23 मई 2026
एक सामान्य नागरिक के लिए इन सुधारों का मतलब साफ है — कम भागदौड़, ज्यादा पारदर्शिता और तेज़ प्रक्रिया।
पहले जहां एक तारीख जानने के लिए कोर्ट पहुंचना पड़ता था, वहीं अब मोबाइल पर जानकारी मिल सकेगी। छोटे विवाद mediation से जल्दी सुलझ सकते हैं। दूरदराज़ के लोग वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के जरिए सुनवाई में शामिल हो पाएंगे।
वकीलों और क्लर्कों के लिए भी रिकॉर्ड मैनेजमेंट आसान होगा। इससे फाइलिंग की गलतियां कम हो सकती हैं और केस ट्रैकिंग अधिक व्यवस्थित बनेगी।
भविष्य की न्याय व्यवस्था की झलक
राजस्थान हाई कोर्ट की ये पहलें सिर्फ तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की सोच में बदलाव का संकेत हैं। अदालतें अब सिर्फ फैसले सुनाने वाली जगह नहीं रहना चाहतीं, बल्कि लोगों तक न्याय को आसान तरीके से पहुंचाने की दिशा में काम कर रही हैं।
अगर यह मॉडल सफल रहता है, तो आने वाले समय में दूसरे राज्य भी इसी तरह की डिजिटल और mediation आधारित व्यवस्थाएं अपना सकते हैं। इससे भारत की न्याय प्रणाली अधिक आधुनिक, तेज़ और नागरिक-केंद्रित बन सकती है।
जोधपुर से शुरू हुआ यह बदलाव आने वाले वर्षों में पूरे देश की अदालतों के लिए एक उदाहरण बन सकता है — जहां न्याय सिर्फ अदालत की चारदीवारी तक सीमित न रहकर लोगों के मोबाइल और डिजिटल दुनिया तक पहुंच जाए।
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23 मई 2026