राजस्थान में हाल ही में एक ऐसी पहल देखने को मिली, जिसने अदालत और स्कूल — दोनों की पारंपरिक तस्वीर को बदल दिया। आमतौर पर लोग जजों को कोर्टरूम में फैसले सुनाते हुए देखते हैं, लेकिन इस बार राज्य के न्यायिक अधिकारी बच्चों के बीच स्कूलों की क्लासरूम में पहुंचे। हाथ में कानूनी फाइलें नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा और डिजिटल जागरूकता से जुड़े संदेश थे। उद्देश्य साफ था — बच्चों को ऑनलाइन दुनिया के खतरों से समय रहते सचेत करना।
राजस्थान में इन दिनों एक ऐसी पहल चर्चा में है, जिसने अदालतों और स्कूलों के बीच की दूरी को कम कर दिया है। आमतौर पर जजों को कोर्टरूम में फैसले सुनाते हुए देखा जाता है, लेकिन इस बार वे बच्चों के बीच स्कूलों में पहुंचे और साइबर सुरक्षा पर क्लास लेने लगे। यह सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि तेजी से बढ़ते साइबर अपराधों के बीच बच्चों को जागरूक बनाने की बड़ी कोशिश थी। इस राज्यव्यापी अभियान का नाम रखा गया — ‘Empowering Rajasthan Youth: A Legal Literacy Initiative – 2026’।
इस अभियान के तहत राजस्थान के अलग-अलग जिलों में करीब 1,400 न्यायिक अधिकारियों ने एक ही दिन में स्कूलों का दौरा किया। इन जजों और न्यायिक अधिकारियों ने कक्षा 8 से 12 तक के छात्रों को साइबर सुरक्षा, ऑनलाइन फ्रॉड, डिजिटल बुलिंग, फेक लिंक और ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी नई तरह की ठगी के बारे में जानकारी दी। इस पहल का लक्ष्य था कि एक ही दिन में लगभग चार लाख छात्रों तक यह संदेश पहुँचाया जाए कि इंटरनेट की दुनिया में सुरक्षित रहना अब उतना ही ज़रूरी है जितना वास्तविक जीवन में सतर्क रहना।
आज के समय में बच्चों और किशोरों की ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा मोबाइल फोन और इंटरनेट से जुड़ चुका है। ऑनलाइन क्लास, सोशल मीडिया, गेमिंग और डिजिटल पेमेंट जैसे माध्यमों ने उनकी दुनिया बदल दी है। लेकिन इसके साथ ही साइबर अपराधियों के लिए भी नए रास्ते खुल गए हैं। राजस्थान में हाल के वर्षों में ऑनलाइन फ्रॉड के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। कई लोग OTP साझा करने, फर्जी लिंक पर क्लिक करने या नकली कॉल्स के झांसे में आकर अपनी जमा पूंजी गंवा चुके हैं। ऐसे में अदालतों की ओर से शुरू की गई यह पहल केवल जागरूकता कार्यक्रम नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा में निवेश मानी जा रही है।
स्कूलों में पहुंचे जजों ने बच्चों को बहुत सरल भाषा में समझाया कि साइबर अपराधी किस तरह काम करते हैं। उन्होंने बताया कि कई बार ठग खुद को बैंक अधिकारी, पुलिसकर्मी या सरकारी एजेंसी का कर्मचारी बताकर फोन करते हैं। वे लोगों को डराते हैं कि उनका बैंक अकाउंट बंद हो जाएगा, आधार कार्ड ब्लॉक हो जाएगा या उनके खिलाफ कोई केस दर्ज हो गया है। इसके बाद वे OTP, UPI PIN या बैंक डिटेल्स मांग लेते हैं। जैसे ही कोई व्यक्ति यह जानकारी साझा करता है, उसके खाते से पैसे निकाल लिए जाते हैं।
बच्चों को विशेष रूप से ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की नई ठगी के बारे में बताया गया। जजों ने समझाया कि इस तरह के फ्रॉड में अपराधी वीडियो कॉल के जरिए खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताते हैं और सामने वाले को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि वह किसी गंभीर अपराध में फंस चुका है। कई मामलों में लोगों को घंटों तक वीडियो कॉल पर रखकर मानसिक दबाव बनाया जाता है और उनसे पैसे ट्रांसफर करवाए जाते हैं। जजों ने बच्चों को समझाया कि किसी भी धमकी भरे कॉल या संदेश की स्थिति में घबराना नहीं चाहिए और तुरंत अपने परिवार तथा पुलिस से संपर्क करना चाहिए।
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इस अभियान की एक खास बात यह भी रही कि इसमें केवल साइबर अपराधों की जानकारी नहीं दी गई, बल्कि बच्चों को उनके कानूनी अधिकारों के बारे में भी जागरूक किया गया। न्यायिक अधिकारियों ने बताया कि अगर कोई बच्चा साइबर बुलिंग, ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग या सोशल मीडिया पर उत्पीड़न का शिकार होता है, तो वह चुप न रहे। शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया, साइबर हेल्पलाइन और पुलिस की भूमिका के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई।
राजस्थान हाईकोर्ट की निगरानी में चल रहे इस कार्यक्रम के तहत ‘Transformative Tuesday’ नाम से हर मंगलवार विशेष सेशन आयोजित किए जा रहे हैं। इन सत्रों में अदालतों के अधिकारी सीधे स्कूलों में जाकर बच्चों से बातचीत करते हैं। यह पहली बार है जब राजस्थान में इतनी बड़ी संख्या में जजों और न्यायिक अधिकारियों को व्यवस्थित रूप से स्कूलों में भेजा गया है। इसका उद्देश्य यह संदेश देना है कि कानून केवल अदालतों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज को जागरूक और सुरक्षित बनाने का माध्यम भी है।
कार्यक्रम के लिए हर जिले में विशेष कंटेंट तैयार किया गया है। इस सामग्री में साइबर अपराध, बाल अधिकार, ऑनलाइन सुरक्षा और शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया को आसान भाषा में समझाया गया है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बच्चों के बीच जानकारी का अंतर कम करने की भी कोशिश की गई है। गांव-कस्बों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को अक्सर साइबर सुरक्षा से जुड़ी उतनी जानकारी नहीं मिल पाती, जितनी बड़े शहरों के निजी स्कूलों में आयोजित वर्कशॉप्स के जरिए मिलती है। इस पहल ने उस अंतर को काफी हद तक कम करने का प्रयास किया है।
इस अभियान का एक बड़ा सामाजिक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है। कई परिवारों में बच्चे तकनीक को अपने माता-पिता से बेहतर समझते हैं। ऐसे में अगर बच्चों को सही जानकारी मिले, तो वे खुद भी सतर्क रह सकते हैं और अपने परिवार को भी ऑनलाइन खतरों से बचा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर घर में किसी को संदिग्ध कॉल या मैसेज आता है, तो जागरूक बच्चा तुरंत पहचान सकता है कि यह साइबर ठगी हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में साइबर अपराध और अधिक जटिल हो सकते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डीपफेक वीडियो और फर्जी डिजिटल पहचान जैसी तकनीकों का गलत इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे समय में केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। लोगों, खासकर बच्चों और युवाओं को पहले से जागरूक करना सबसे प्रभावी तरीका माना जा रहा है। राजस्थान का यह मॉडल इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
इस पहल ने न्यायपालिका की भूमिका को भी एक नया आयाम दिया है। आमतौर पर अदालतों को केवल कानून लागू करने और सज़ा देने वाली संस्था के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह अभियान दिखाता है कि न्यायपालिका समाज में जागरूकता फैलाने और अपराध रोकने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अगर यह मॉडल सफल रहता है, तो आने वाले समय में दूसरे राज्य भी इसे अपनाने की कोशिश कर सकते हैं।
राजस्थान की यह पहल सिर्फ साइबर सुरक्षा अभियान नहीं, बल्कि समाज और न्याय व्यवस्था के बीच भरोसे को मजबूत करने की कोशिश भी है। जब बच्चे सीधे जजों से बातचीत करते हैं, तो कानून उनके लिए डर का विषय नहीं बल्कि सुरक्षा और मदद का माध्यम बनता है। डिजिटल दौर में जहां हर दिन नई तकनीक और नए खतरे सामने आ रहे हैं, वहां इस तरह की पहलें आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित और जागरूक बनाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
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