दुनिया भर में बढ़ती जंगल की आग, रिकॉर्ड हीटवेव और जहरीला धुआँ अब एक बड़े हेल्थ इमरजेंसी का रूप ले चुके हैं। लैंसेट काउंटडाउन 2025 रिपोर्ट के अनुसार, अत्यधिक गर्मी से होने वाली मौतों में 23% वृद्धि हुई है और हर साल लाखों लोग हीटवेव, वायु प्रदूषण और जंगल की आग के धुएँ की वजह से जान गंवा रहे हैं। बढ़ते तापमान के कारण डेंगू जैसी बीमारियाँ भी तेजी से फैल रही हैं।
जलवायु संकट अब सिर्फ़ वैज्ञानिक रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है। यह सीधे इंसानी जीवन, स्वास्थ्य, रोज़गार और भविष्य को प्रभावित करने वाली वास्तविकता बन चुका है। दुनिया भर में बढ़ती जंगल की आग, रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव, जहरीला धुआँ और तेजी से फैलती बीमारियाँ इस बात का संकेत हैं कि धरती एक बड़े हेल्थ इमरजेंसी की तरफ़ बढ़ रही है। हाल ही में सामने आई लैंसेट काउंटडाउन 2025 रिपोर्ट और रॉयटर्स की वैश्विक रिपोर्टों ने साफ़ चेतावनी दी है कि अगर दुनिया ने अब भी जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले सालों में हालात और भयावह हो सकते हैं।
इस साल दुनिया के कई हिस्सों में जंगल की आग ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। अफ़्रीका, एशिया, यूरोप, कनाडा और अमेरिका के कई इलाकों में लाखों हेक्टेयर जंगल जल गए। इन आगों ने सिर्फ़ पेड़ों और वन्यजीवों को नुकसान नहीं पहुँचाया, बल्कि इंसानी बस्तियों को भी भारी खतरे में डाल दिया। आग से उठने वाला धुआँ हजारों किलोमीटर दूर तक फैल रहा है और बड़े शहरों की हवा को जहरीला बना रहा है। कई जगहों पर लोगों को घरों के अंदर रहने की सलाह दी गई क्योंकि हवा में मौजूद खतरनाक कण सांस की बीमारियों को तेजी से बढ़ा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता तापमान और लंबे समय तक सूखा जंगल की आग को और खतरनाक बना रहे हैं। पहले जिन क्षेत्रों में कभी-कभार आग लगती थी, वहाँ अब हर साल बड़े स्तर पर आग फैल रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का संतुलन बिगड़ चुका है। कहीं अत्यधिक गर्मी है, तो कहीं अचानक भारी बारिश और बाढ़। यह अस्थिर मौसम पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुका है।
लैंसेट काउंटडाउन 2025 की रिपोर्ट ने इस संकट के स्वास्थ्य प्रभावों पर गंभीर चेतावनी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, 1990 के दशक की तुलना में हीट-रिलेटेड मौतों में लगभग 23 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हर साल करीब 5.46 लाख लोग अत्यधिक गर्मी के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं। यह आंकड़ा सिर्फ़ एक संख्या नहीं, बल्कि उन परिवारों की कहानी है जिन्होंने अपने प्रियजनों को गर्मी की मार में खो दिया।
हीटवेव अब सामान्य गर्मी नहीं रह गई। कई देशों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुँच रहा है। ऐसी गर्मी में बाहर काम करना बेहद खतरनाक हो जाता है। निर्माण मजदूर, किसान, रिक्शा चालक, डिलीवरी कर्मचारी और सड़क पर काम करने वाले लाखों लोग सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं। शरीर लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी सहन नहीं कर पाता, जिससे डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक, हार्ट अटैक और किडनी की समस्याएँ बढ़ती हैं।
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जंगल की आग से निकलने वाला धुआँ भी एक बड़ा खतरा बन चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, हर साल लगभग 1.5 लाख अतिरिक्त मौतें सिर्फ़ वाइल्डफायर स्मोक के संपर्क में आने से हो रही हैं। धुएँ में मौजूद सूक्ष्म कण फेफड़ों में जाकर अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और अन्य सांस संबंधी बीमारियों को बढ़ाते हैं। बच्चे, बुज़ुर्ग और पहले से बीमार लोग इसके सबसे आसान शिकार बनते हैं।
इसके अलावा फॉसिल फ्यूल यानी कोयला, पेट्रोल और डीज़ल से होने वाला वायु प्रदूषण भी दुनिया भर में करीब 25 लाख मौतों से जुड़ा हुआ है। बड़े शहरों की हवा लगातार जहरीली होती जा रही है। भारत जैसे देशों में यह समस्या और गंभीर है, जहाँ प्रदूषण और गर्मी मिलकर स्वास्थ्य संकट को और बढ़ा देते हैं।
जलवायु परिवर्तन सिर्फ़ मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बीमारियों के फैलाव को भी प्रभावित कर रहा है। तापमान बढ़ने के कारण डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियाँ नए क्षेत्रों में फैल रही हैं। लैंसेट रिपोर्ट के अनुसार, 1950 के दशक की तुलना में आज डेंगू ट्रांसमिशन की संभावना लगभग 49 प्रतिशत बढ़ चुकी है। गर्म और नम मौसम मच्छरों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है, जिससे संक्रमण तेजी से फैलता है।
भारत में यह खतरा और बड़ा दिखाई देता है। हर साल मानसून के बाद डेंगू के मामले तेजी से बढ़ते हैं। अब जलवायु परिवर्तन के कारण यह बीमारी उन इलाकों में भी पहुँच रही है जहाँ पहले इसका खतरा कम था। स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में संक्रामक बीमारियों का दबाव स्वास्थ्य तंत्र पर भारी पड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की उच्चतम अदालत ने भी हाल ही में जलवायु परिवर्तन को “अस्तित्वगत खतरा” बताया। अदालत ने कहा कि देशों की जिम्मेदारी है कि वे अपने क्लाइमेट ऑब्लिगेशंस को गंभीरता से पूरा करें। यदि कोई देश जलवायु लक्ष्यों की अनदेखी करता है, तो भविष्य में उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेह ठहराया जा सकता है। यह बयान दिखाता है कि अब क्लाइमेट संकट केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक न्याय और मानव अधिकारों का प्रश्न बन चुका है।
भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती लेकर आती है। एक तरफ़ देश को आर्थिक विकास और ऊर्जा की जरूरतें पूरी करनी हैं, दूसरी तरफ़ जलवायु संकट से निपटना भी जरूरी है। हीटवेव, सूखा, अचानक बाढ़, चक्रवात और प्रदूषण का असर सीधे कृषि, उद्योग और रोज़गार पर पड़ रहा है। किसानों की फसलें खराब हो रही हैं, पानी की कमी बढ़ रही है और शहरों में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच रही है।
सबसे अधिक असर गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों पर पड़ता है। जिनके पास पक्के घर नहीं हैं, जिनके काम खुले वातावरण में होते हैं या जिनके पास स्वास्थ्य सुविधाओं तक आसान पहुँच नहीं है, वे जलवायु संकट की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं। आर्थिक असमानता इस संकट को और गहरा बना रही है।
आम लोगों के लिए अब क्लाइमेट चेंज कोई दूर की बहस नहीं रही। यह रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। गर्मी से बचाव, साफ़ पानी की उपलब्धता, धुएँ और प्रदूषण से सुरक्षा तथा मच्छरों से बचने के उपाय अब बुनियादी जरूरत बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हीटवेव के दौरान दोपहर में बाहर निकलने से बचें, शरीर को हाइड्रेट रखें, हल्के कपड़े पहनें और सरकारी अलर्ट का पालन करें। प्रदूषण और धुएँ के समय मास्क का उपयोग भी जरूरी हो सकता है।
इसके साथ ही सरकारों और उद्योगों को भी तेजी से कदम उठाने होंगे। साफ़ ऊर्जा को बढ़ावा देना, जंगलों की सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना और स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करना अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता है। यदि दुनिया ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियों को और गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन की यह चेतावनी साफ़ है — यह सिर्फ़ धरती को नहीं, इंसानी जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है। आज लिया गया हर फैसला आने वाले वर्षों की सुरक्षा तय करेगा। इसलिए यह समय बहस का नहीं, बल्कि तेज़ और सामूहिक कार्रवाई का है।
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