पाकिस्तान के लाहौर में कई इलाकों और सड़कों के पुराने नाम फिर से बहाल किए जा रहे हैं। इस्लामपुरा को “कृष्ण नगर” और बाबरी मस्जिद चौक को “जैन मंदिर चौक” नाम दिया गया है। बताया जा रहा है कि यह पहल नवाज शरीफ के समर्थन से हो रही है, जिसका उद्देश्य लाहौर की पुरानी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को दोबारा सामने लाना है। इस फैसले के बाद पाकिस्तान में इतिहास और विरासत को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
पाकिस्तान का सांस्कृतिक शहर लाहौर इन दिनों एक बड़े बदलाव की वजह से चर्चा में है। शहर में कई इलाकों, चौकों और सड़कों के पुराने नाम फिर से वापस लाए जा रहे हैं। यह कदम केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे लाहौर की ऐतिहासिक और बहु-सांस्कृतिक पहचान को दोबारा सामने लाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में लाहौर के कई इलाकों के इस्लामीकरण के बाद रखे गए नाम हटाकर पुराने हिंदू, सिख और औपनिवेशिक दौर के नाम दोबारा लगाए गए हैं। उदाहरण के तौर पर इस्लामपुरा को फिर से कृष्ण नगर कहा जाने लगा है, जबकि बाबरी मस्जिद चौक का नाम बदलकर जैन मंदिर चौक कर दिया गया है। इसी तरह लक्ष्मी चौक, धरमपुरा, क्वींस रोड और लॉरेंस गार्डन जैसे पुराने नाम भी वापस लौट रहे हैं।
बताया जा रहा है कि यह पूरा प्रोजेक्ट पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के समर्थन से आगे बढ़ रहा है। इस योजना का मकसद लाहौर की पुरानी सांस्कृतिक विरासत और साझा इतिहास को दोबारा पहचान दिलाना है। पाकिस्तान के कई इतिहासकारों और सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि विभाजन से पहले लाहौर हिंदू, सिख, मुस्लिम और ब्रिटिश संस्कृति का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था। शहर की गलियों, बाजारों और इमारतों में उसी मिश्रित विरासत की झलक दिखाई देती थी।
लाहौर पहले भी अपनी ऐतिहासिक इमारतों, क्रिकेट मैदानों, क्लब क्षेत्रों और पारंपरिक अखाड़ों के लिए जाना जाता रहा है। अब प्रशासन पुराने नामों को वापस लाकर शहर की उसी ऐतिहासिक पहचान को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। शहर में नए साइनबोर्ड लगाए जा रहे हैं, जिन पर पुराने नाम फिर दिखाई देने लगे हैं। हालांकि इस फैसले को लेकर पाकिस्तान में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे इतिहास और संस्कृति को सम्मान देने वाला कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ धार्मिक और राजनीतिक संगठन इसका विरोध भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि पुराने नाम वापस लाना देश की मौजूदा पहचान के खिलाफ है। इसके बावजूद प्रशासन फिलहाल इस योजना को आगे बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव केवल लाहौर तक सीमित नहीं रह सकता। अगर यह योजना सफल रहती है, तो पाकिस्तान के दूसरे पुराने शहरों में भी ऐतिहासिक नामों और विरासत को फिर से सामने लाने की कोशिशें तेज हो सकती हैं। फिलहाल लाहौर में हो रहे ये बदलाव दक्षिण एशिया की राजनीति, इतिहास और सांस्कृतिक पहचान पर नई बहस छेड़ रहे हैं।
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