जोधपुर पुलिस ने शहर के पुराने और भीड़भाड़ वाले इलाकों में साइकिल गश्त शुरू की है। इस पहल का मकसद पेट्रोल बचाना, प्रदूषण कम करना और जनता के बीच पुलिस की मौजूदगी बढ़ाना है। साइकिल पेट्रोलिंग से तंग गलियों में तुरंत रेस्पॉन्स देना आसान हो रहा है और लोगों के लिए पुलिस से बातचीत करना भी सहज बन रहा है। साथ ही, रेलवे स्टेशनों और शहर के संवेदनशील इलाकों में सीसीटीवी निगरानी भी बढ़ाई जा रही है, जिससे डिजिटल सुरक्षा और ज़मीनी गश्त दोनों को मजबूत किया जा सके।
राजस्थान के जोधपुर शहर में इन दिनों पुलिस की एक अलग तस्वीर देखने को मिल रही है। आमतौर पर जीप, बाइक या बड़ी गाड़ियों में गश्त करने वाली पुलिस अब कई इलाकों में साइकिल पर नज़र आ रही है। पुराने शहर की संकरी गलियों, भीड़भाड़ वाले बाज़ारों और रिहायशी क्षेत्रों में पुलिसकर्मी साइकिल से पेट्रोलिंग करते दिखाई दे रहे हैं। यह पहल सिर्फ़ एक प्रयोग नहीं, बल्कि बदलते समय के साथ पुलिसिंग के तरीके को ज़्यादा ज़मीनी और लोगों के करीब बनाने की कोशिश मानी जा रही है।
पुलिस अधिकारियों का मानना है कि कई ऐसे इलाके हैं जहाँ गाड़ियों का पहुँचना मुश्किल होता है। तंग रास्तों और ट्रैफिक की वजह से कई बार पुलिस को मौके तक पहुँचने में समय लग जाता है। ऐसे में साइकिल गश्त तेज़ और आसान विकल्प बनकर सामने आई है। इससे पुलिस की “visible presence” बढ़ती है और छोटी-मोटी वारदातों, छेड़छाड़ या संदिग्ध गतिविधियों पर तुरंत नज़र रखी जा सकती है।
इस पहल का एक बड़ा उद्देश्य पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ती लागत को कम करना भी बताया जा रहा है। लगातार बढ़ते ईंधन खर्च के बीच पुलिस विभाग अब ऐसे विकल्प तलाश रहा है जो कम खर्चीले होने के साथ पर्यावरण के लिए भी बेहतर हों। साइकिल गश्त के ज़रिए एक संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सरकारी विभाग भी ईंधन बचत और प्रदूषण कम करने की दिशा में कदम उठा सकते हैं।
कम्युनिटी पुलिसिंग के लिहाज़ से भी यह मॉडल काफ़ी अहम माना जा रहा है। जब पुलिसकर्मी साइकिल पर किसी मोहल्ले या बाज़ार से गुजरते हैं तो लोग उनसे आसानी से बातचीत कर पाते हैं। कई लोगों का कहना है कि गाड़ी में बैठी पुलिस की तुलना में साइकिल पर मौजूद पुलिसकर्मी ज़्यादा “approachable” महसूस होते हैं। इससे शिकायत दर्ज कराने या छोटी समस्याएँ बताने में लोगों की झिझक भी कम होती है।
महिलाओं, दुकानदारों और स्कूल-कॉलेज जाने वाले छात्रों के लिए भी यह पहल राहत देने वाली मानी जा रही है। भीड़भाड़ वाले इलाकों में पुलिस की लगातार मौजूदगी से सुरक्षा का एहसास बढ़ता है। स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि साइकिल गश्त से बाज़ारों में अनुशासन बना रहेगा और असामाजिक तत्वों पर भी निगरानी आसान होगी।
दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ़ जोधपुर ही नहीं, राजस्थान के दूसरे शहरों में भी पुलिस अब “इको-फ्रेंडली पेट्रोलिंग” की ओर बढ़ रही है। जयपुर सहित कई शहरों में इसी तरह की पहल शुरू हो चुकी है। दुनिया के कई देशों में साइकिल पेट्रोलिंग को कम्युनिटी पुलिसिंग का प्रभावी मॉडल माना जाता है, क्योंकि इससे पुलिस और जनता के बीच भरोसा मज़बूत होता है।
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इसी के साथ सुरक्षा व्यवस्था को तकनीक से जोड़ने का काम भी तेज़ी से किया जा रहा है। जोधपुर डिविज़न में रेलवे स्टेशनों और आसपास के इलाकों में सीसीटीवी कैमरों का नेटवर्क लगातार बढ़ाया जा रहा है। रेलवे सुरक्षा को मजबूत करने के लिए डिजिटल निगरानी और ज़मीनी गश्त — दोनों पर एक साथ काम हो रहा है। ऐसे में शहर में “डिजिटल पहरा” और साइकिल पेट्रोलिंग का कॉम्बिनेशन सुरक्षा व्यवस्था को नया रूप देता दिखाई दे रहा है।
कुल मिलाकर, जोधपुर पुलिस की यह पहल सिर्फ़ गश्त का तरीका बदलने तक सीमित नहीं है। यह पुलिस और जनता के बीच दूरी कम करने, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी दिखाने और शहर में सुरक्षा का भरोसा बढ़ाने की दिशा में एक नई सोच के तौर पर देखी जा रही है।
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