आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ तेज़ चिप्स का खेल नहीं रह गया है। दुनिया भर में बढ़ते AI डेटा सेंटर्स इतनी तेजी से बिजली खपत कर रहे हैं कि ऊर्जा विशेषज्ञ अब इसे आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौतियों में गिन रहे हैं।
दुनिया इस समय AI क्रांति के दौर से गुजर रही है। चैटबॉट, वीडियो जेनरेशन, ऑटोमेशन, मेडिकल रिसर्च और स्मार्ट सर्च जैसी तकनीकें तेजी से लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन रही हैं। लेकिन AI की इस तेज़ रफ्तार के बीच अब एक नई और बड़ी चिंता सामने आ रही है — बिजली की बढ़ती मांग।
ताज़ा अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और रिसर्च बताती हैं कि आने वाले वर्षों में AI डेटा सेंटर्स दुनिया की बिजली खपत को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा सकते हैं। अब टेक कंपनियों के सामने सबसे बड़ा सवाल सिर्फ बेहतर AI चिप्स बनाना नहीं, बल्कि उन चिप्स को लगातार बिजली देना बन गया है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी IEA की “Electricity 2026” रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में डेटा सेंटर्स की बिजली मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है। खासकर AI आधारित वर्कलोड्स इस बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह बन रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में 2026 से 2030 के बीच जितनी अतिरिक्त बिजली मांग बढ़ने का अनुमान है, उसका लगभग आधा हिस्सा अकेले डेटा सेंटर्स से आएगा।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2030 तक दुनिया भर के डेटा सेंटर्स सालाना 900 से 1200 टेरावॉट–घंटे तक बिजली खपत कर सकते हैं। यह आज की तुलना में लगभग दोगुनी खपत होगी। आसान भाषा में समझें तो यह कई बड़े देशों की कुल बिजली खपत के बराबर हो सकती है।
AI की बढ़ती ताकत के पीछे काम करने वाले विशाल डेटा सेंटर्स अब छोटे इंडस्ट्रियल प्लांट जैसे बन चुके हैं। कंज़्यूमर रिपोर्ट्स के अनुसार एक बड़ा “हाइपरस्केल” डेटा सेंटर करीब 100 मेगावॉट तक बिजली इस्तेमाल कर सकता है। इतनी बिजली लगभग 1 लाख घरों की जरूरत के बराबर मानी जाती है।
कुछ टेक कंपनियां तो ऐसे मेगा प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हैं जिनकी बिजली मांग 5 गीगावॉट तक पहुंच सकती है। यह कई छोटे शहरों की कुल बिजली जरूरत से भी ज्यादा हो सकती है। यही वजह है कि ऊर्जा विशेषज्ञ अब AI को सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौती भी मान रहे हैं।
असल चिंता सिर्फ डेटा सेंटर्स की संख्या बढ़ने की नहीं है, बल्कि AI टास्क की भारी बिजली खपत भी है। एक सामान्य वेब सर्च की तुलना में बड़ा जनरेटिव AI मॉडल कई गुना ज्यादा बिजली इस्तेमाल कर सकता है। कुछ विश्लेषणों में दावा किया गया है कि जटिल AI प्रोसेसिंग पारंपरिक सर्च से लगभग 1000 गुना तक ज्यादा ऊर्जा ले सकती है।
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की रिपोर्ट के अनुसार AI सर्वर्स से जुड़ी बिजली खपत हर साल करीब 30 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2024 से 2030 के बीच डेटा सेंटर्स की कुल अतिरिक्त बिजली खपत का लगभग आधा हिस्सा अकेले AI सिस्टम्स से आ सकता है।
गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों का अनुमान और भी ज्यादा चिंताजनक माना जा रहा है। उनके मुताबिक 2030 तक AI डेटा सेंटर्स की ऊर्जा मांग 2023 के मुकाबले लगभग 175 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। इसका सीधा मतलब है कि अगर बिजली उत्पादन और ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर उसी रफ्तार से नहीं बढ़े, तो कई देशों को ऊर्जा संकट जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
इसी मुद्दे पर दावोस में हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 के दौरान अरबपति कारोबारी Elon Musk ने भी बड़ी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि AI की असली लिमिट अब चिप्स नहीं, बल्कि इलेक्ट्रिकल पावर है। उनके अनुसार AI चिप्स का प्रोडक्शन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन बिजली उत्पादन और पावर ग्रिड का विस्तार उसी स्पीड से नहीं हो पा रहा।
मस्क का बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इस समय दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर अरबों डॉलर खर्च कर रही हैं। लेकिन अगर पर्याप्त बिजली उपलब्ध नहीं हुई, तो इन सुपरकंप्यूटिंग सिस्टम्स को चलाना मुश्किल हो सकता है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए कई कंपनियां अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर काम कर रही हैं। कुछ कंपनियां ऑफ-ग्रिड ऊर्जा सिस्टम्स, छोटे न्यूक्लियर रिएक्टर्स और स्पेस-बेस्ड सोलर प्रोजेक्ट्स जैसे महत्वाकांक्षी आइडिया पर रिसर्च कर रही हैं। मकसद यह है कि डेटा सेंटर्स को लगातार साफ और स्थिर बिजली मिलती रहे, बिना स्थानीय पावर ग्रिड पर ज्यादा दबाव डाले।
हालांकि इसका असर सिर्फ बड़ी टेक कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। आम लोगों की जिंदगी पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। अगर किसी शहर या इलाके में अचानक कई बड़े AI डेटा सेंटर्स बनते हैं, तो वहां बिजली की कीमतें बढ़ सकती हैं। साथ ही पानी की खपत और ग्रिड स्थिरता पर भी दबाव बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार डेटा सेंटर्स सिर्फ बिजली ही नहीं, बल्कि भारी मात्रा में पानी भी इस्तेमाल करते हैं। सर्वर्स को ठंडा रखने के लिए लगातार कूलिंग सिस्टम चलाने पड़ते हैं। ऐसे में पानी की कमी वाले इलाकों में यह बड़ी समस्या बन सकती है।
कुछ रिपोर्ट्स में चेतावनी दी गई है कि 2027 तक करीब 40 प्रतिशत AI डेटा सेंटर्स स्थानीय पावर शॉर्टेज की वजह से प्रभावित हो सकते हैं। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में सिर्फ तेज AI बनाना काफी नहीं होगा, बल्कि मजबूत बिजली व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी होगी।
टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर AI का विस्तार इसी रफ्तार से जारी रहा, तो सरकारों और कंपनियों को मिलकर बड़े स्तर पर निवेश करना होगा। रिन्यूएबल एनर्जी, स्मार्ट ग्रिड, बैटरी स्टोरेज और बेहतर वॉटर मैनेजमेंट सिस्टम्स के बिना AI का भविष्य चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
आने वाले वर्षों में AI लोगों की रोजमर्रा जिंदगी का और बड़ा हिस्सा बनने वाला है। ऐसे में सबसे अहम सवाल यही होगा कि क्या दुनिया के पास इतनी बिजली है कि वह इस डिजिटल क्रांति को लगातार चला सके।
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