अमेरिका के बोस्टन में रहने वाला 19 वर्षीय Delmace Mayo अपनी दूसरी लगातार बोस्टन मैराथन की तैयारी में जुटा है। व्हीलचेयर एथलीट के तौर पर वह सिर्फ रेस नहीं दौड़ रहा, बल्कि LA 2028 पैरालिंपिक तक पहुंचने और दुनिया भर के दिव्यांग युवाओं के लिए उम्मीद बनने का सपना भी बुन रहा है।
अमेरिका के बोस्टन शहर की ठंडी सड़कों पर हर सुबह एक युवा अपनी व्हीलचेयर के पहियों के साथ भविष्य की तरफ दौड़ लगाता है। यह सिर्फ फिटनेस या किसी एक मैराथन की तैयारी नहीं, बल्कि एक ऐसे सपने की कहानी है जो संघर्ष, आत्मविश्वास और उम्मीद से बना है। 19 वर्षीय Delmace Mayo आज उन युवाओं में शामिल हो चुका है जिनकी कहानी खेलों से कहीं आगे जाकर इंस्पिरेशन का चेहरा बन रही है।
हैती मूल के Delmace Mayo बचपन से ही शारीरिक चुनौतियों का सामना करते आए हैं। कई बच्चों के लिए जहां खेल का मैदान सिर्फ मनोरंजन होता है, वहीं Delmace के लिए स्पोर्ट्स अपनी पहचान बनाने का जरिया बन गया। व्हीलचेयर में बैठकर दुनिया को देखने वाले इस युवा ने बहुत जल्दी समझ लिया था कि जिंदगी उसे आसान रास्ता देने वाली नहीं है। लेकिन उसने भी तय कर लिया कि वह अपनी कहानी खुद लिखेगा।
बोस्टन मैराथन दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित रेसों में गिनी जाती है। इसमें हिस्सा लेना ही कई एथलीट्स का सपना होता है, लेकिन Delmace के लिए यह सिर्फ भागीदारी नहीं है। वह लगातार दूसरी बार इस मैराथन में उतर रहा है और उसका लक्ष्य सीधे 2028 लॉस एंजेलिस पैरालिंपिक तक जाता है। उसकी नजर सिर्फ फिनिश लाइन पर नहीं, बल्कि उस मंच पर है जहां दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पैरा एथलीट अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं।
Olympics.com की रिपोर्ट के मुताबिक Delmace मानता है कि हर रेस उसके लिए एक मैसेज है। वह चाहता है कि लोग उसे सिर्फ “व्हीलचेयर एथलीट” के तौर पर न देखें, बल्कि एक ऐसे युवा के रूप में पहचानें जिसने सीमाओं को चुनौती देने का फैसला किया। उसकी सोच साफ है — अगर वह ट्रैक पर खुद को साबित कर सकता है, तो दुनिया का कोई भी बच्चा अपने सपनों को छोटा नहीं समझे।
Delmace की जिंदगी का बड़ा हिस्सा संघर्षों से भरा रहा है। कॉलेज की पढ़ाई, ट्रेनिंग, हेल्थ मैनेजमेंट और आर्थिक चुनौतियों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होता। कई बार ट्रेनिंग के लिए जरूरी इक्विपमेंट और ट्रैवल खर्च भी चिंता का कारण बनते हैं। लेकिन इसके बावजूद वह हर सुबह अभ्यास के लिए निकलता है। बोस्टन की सड़कों पर उसकी व्हीलचेयर की आवाज सिर्फ मेहनत की नहीं, बल्कि जिद की आवाज बन चुकी है।
इस सफर में Challenged Athletes Foundation यानी CAF जैसी संस्थाओं ने भी अहम भूमिका निभाई है। यह संस्था दुनिया भर के दिव्यांग खिलाड़ियों को ट्रेनिंग, इक्विपमेंट और फाइनेंशियल सपोर्ट उपलब्ध कराती है। Delmace भी उन खिलाड़ियों में शामिल है जिन्हें ऐसे प्लेटफॉर्म से आगे बढ़ने का मौका मिला। CAF का मकसद सिर्फ खिलाड़ियों को तैयार करना नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि सही अवसर मिलने पर दिव्यांग खिलाड़ी भी दुनिया के सबसे बड़े मंच पर चमक सकते हैं।
आज पैरालिंपिक खेल सिर्फ “स्पेशल कैटेगरी” का हिस्सा नहीं रह गए हैं। दुनिया भर में इनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। कई देशों में पैरा एथलीट्स को अब उसी सम्मान से देखा जा रहा है जैसा ओलंपिक खिलाड़ियों को मिलता है। Delmace जैसे युवा इसी बदलाव की नई पहचान बन रहे हैं। वे लोगों को यह समझा रहे हैं कि खेल में असली ताकत शरीर की नहीं, मानसिक हिम्मत की होती है।
Delmace की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि वह अपनी सफलता को सिर्फ निजी उपलब्धि नहीं मानता। उसका कहना है कि अगर उसकी रेस देखकर कोई छोटा बच्चा, जो व्हीलचेयर या किसी दूसरी डिसएबिलिटी के साथ जिंदगी जी रहा है, यह सोच ले कि “मैं भी कर सकता हूं”, तो उसकी मेहनत सफल हो जाएगी। यही सोच उसे बाकी एथलीट्स से अलग बनाती है।
अमेरिका में पैरा स्पोर्ट्स के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर लगातार मजबूत हो रहा है, लेकिन दुनिया के कई देशों में स्थिति अब भी चुनौतीपूर्ण है। भारत जैसे देश में भी लाखों दिव्यांग युवा खेलों में आगे आना चाहते हैं, लेकिन उन्हें सुविधाएं, ट्रेनिंग और सपोर्ट नहीं मिल पाता। छोटे शहरों और कस्बों में व्हीलचेयर स्पोर्ट्स, पैरा-बैडमिंटन या रनिंग जैसी गतिविधियां अब भी सीमित हैं।
ऐसे में Delmace Mayo जैसी कहानियां सिर्फ एक विदेशी एथलीट की सफलता नहीं, बल्कि एक बड़ा संदेश बनकर सामने आती हैं। यह याद दिलाती हैं कि प्रतिभा किसी शहर, देश या शरीर की मोहताज नहीं होती। जरूरत सिर्फ अवसर, सपोर्ट और भरोसे की होती है।
आज जब दुनिया स्पोर्ट्स को सिर्फ मेडल और रिकॉर्ड के नजरिए से देखती है, तब Delmace जैसे खिलाड़ी यह साबित करते हैं कि खेल इंसान की हिम्मत, आत्मविश्वास और उम्मीद की सबसे बड़ी पहचान भी हो सकते हैं। बोस्टन की सड़कों से शुरू हुआ उसका सफर अब 2028 पैरालिंपिक के सपने की तरफ बढ़ रहा है, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि वह हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है। उसकी कहानी बताती है कि मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी हों, अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी फिनिश लाइन दूर नहीं होती।
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